और भूल गए जीवनदायिनी ....
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सब भूले मुख्य मुद्दा..

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देश के हर कोने में इस वक्त चुनावी चर्चाओं का आलम है . देश का हर व्यक्ति विकास के विभिन्न आयामों पर विभिन्न मुद्दों को लेकर विचार विमर्श करता हुआ नजर आ रहा है ताकि हमारा देश शीघ्र ही विश्व मानचित्र पर विकसित देशों की क्ष्रेणी में आ सके. एक बार फिर इस बार भारत देश की जनता सरकार चुनने जा रही है . देश के प्रत्येक नागरिक की चाह है की सत्ता का हस्तांतरण ऐसे हाथों में हो जो हमारे देश के प्रत्येक नागरिक के विकास को ध्यान में रखते हुए देश के विकासशील पथ पर आगे पड़े . जिसके चलते इस वक्त विभिन्न राजनितिक दलों के नेता विकास के बड़े बड़े वादे करते हुए नजर आ रहा है जिनमे से कोई सड़क , पानी , बिजली जैसे मूलभूत सुविधाओं वाले मुद्दे जो की देश के आजादी से ही चले आ रहे है ,की बात कर रहा है तो कोई रोजगार, औद्योगिकीकरण के जरिये देश का विकास करना चाहता है तो कोई विभिन्न जातियों को समृद्ध करने जैसे वादे . ऐसे में मीडिया का भी भरपूर उपयोग इन नेताओं द्वारा अपनी बात जनता तक पहुचाने के लिए किया जा रहा है वही मीडिया भी विकास के विभिन्न मुद्दों पर चर्चा कर अपनी सशक्त भूमिका अदा करता हुआ देखा जा सकता है जैसा की आप सब जानते है की पर्यावरण और प्रकृति के बिना धरती पर जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती . एक और जहाँ देश प्रगति के पथ पर है वही हमारा प्राकृतिक वातावरण लगातार दुर्गति की मार झेल रहा है जिसके चलते दूषित वायु के साथ यहाँ की जनता दूषित पानी पीने को मजबूर है परिणाम स्वरुप दिन प्रतिदिन फैलती विभिन्न प्रकार की बीमारियां देश में मृत्यु दर बढ़ने का एक प्रमुख कारण बन रही है देश के दिग्गज नेताओं ने कुर्सी के खेल में जनता से वादे तो बहुत कर दिए परन्तु जीवन दायिनी प्रकृति की सुरक्षा और समृद्धि का नाम लेना तक भूल गए एक ओर देश का प्राकृतिक संसाधन एवं जैव विविधता खतरे में है .सारा विश्व ग्लोबल वार्मिंग जैसे बड़े खतरे से जूझ रहा है वैश्विक स्तर पर जैव विविधता बनाये रखने तथा वातावरण परिवर्तन जैसे खतरों से बचने के लिए विश्वस्तरीय मंचों पर विभिन्न देशों के प्रमुखों द्वारा मंथन किया जा रहा है वही हमारे नेता अभी भी सड़क ,बिजली , पानी जैसी मूलभूत सुविधएं जनता के लिए जुटाने में जुटे हुए है . ऐसे में सवाल यह उठता है की इन मूलभूत सुविद्याओं को प्रदान करने वाली हमारी प्रकृति ही जब खतरे में है तो ये वादे कैसे पूरे हो सकते है किसी समय में हमारा भारत देश भरपूर प्राकृतिक संसाधनों की वजह से " सोने की चिड़िया " कहलाता था परन्तु यहाँ के शासन की अनदेखी और लापरवाही के चलते अब " चिड़िया" देखना भी सपने जैसे लगने लगा है . लगातार हमारा प्राकृतिक संतुलन बिगड़ता जा रहा है अब प्रकृति के अभिन्न अंग पेड़, पौधे या तो प्रचलित होने के लिए लगाये जाते है या फिर विदेशों से विभिन्न प्रकार का फंड हड़पने के लिए ऐसा करने के बाद उन पेड़ पौधों के जीवन की किसी को परवाह नहीं होती और बहुत ही जल्द वो दम तोड़ते हुए नजर आते नतीजन अब इंसान भी ऑक्सीजन की कमी के कारण दम तोड़ने लगे है ऐसे में वो दिन दूर नहीं की तरह आज पानी की एक एक बूँद मोल में खरीद कर देशवासियों द्वारा अपनी प्यास बुझाई जा रही है वही ऑक्सीजन भी खरीद कर लेनी पड़ेगी प्राकर्तिक संसाधनों में होती लगातार गिरावट व बिगड़ता प्राकृतिक संतुलन देश में सुनामी , भूकम्प, बाढ़ व सुखा जैसे भयंकर परिणामों में नजर आती है और ऐसे प्राकृतिक हादसों के दौरान ज्यादातर राजनितिक नेताओं द्वारा या तो राजनितिक चालें चलकर एक दूसरे दलों पर आरोप - प्रत्यारोप लगाया जाता है या फिर मौके पर पहुंच आगामी चुनावों को ध्यान में रखते हुए जनता की सहानुभूति बटोरी जाती है परन्तु असली कारण तक कोई नहीं पहुचना चाहता है ऐसे में इस देश की इस प्रकृति की पुकार है इस देश के नेताओं से अपने मुद्दों में मुख्य रूप से इसे भी शामिल करे ताकि ईश्वर की दें ये प्रकृति स्वयं पर अंशु बहाने की जगह इसके शागिर्दों को बेहतर लालन पालन दे सके
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