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लोकसभा चुनाव -2014

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लोकतंत्र के सबसे बड़े महापर्व लोकसभा चुनावों कि तयारी में एक ओर जहाँ पूरा देश सराबोर हुआ पड़ा है वृहद स्तर पर चुनाव आयोग द्वारा मतदाताओं को जागरूक करने के लिए मतदाता जागरूकता अभियान चलाये जा रहे है यहाँ तक कि जनता के करोड़ों रूपए भी अब तक इस अभियान के तहत खर्च किये जा चुके है ताकि लोकतंत्र के इस महापर्व का ज्यादा से जयादा नागरिक हिस्सा बन सके . ग्रामीण अंचल से लेकर मेट्रो शहरों में भी इस अभियान कि जीवित तस्वीर जगह जगह देखी जा सकती है

इस सन्दर्भ में यदि हम बात करे राजस्थान के भरतपुर ज़िले की तो स्तिथि बहुत अलग नजर आती है जिसके चलते अब यहाँ लोकसभा चुनावों में जनता की भागीदारी को लेकर भी अब सवाल खड़े होने लगे है वही मतदाता जागरूकता अभियान के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति ही नजर आती है वही जब इस पूरे मामले की जाँच के लिए हमने यहाँ की जनता से लोकसभा चुनावों की जानकारी लेनी चाही तो एक बड़ा वर्ग ऐसा था जिसे चुनावों की जानकारी ही नहीं थी न मतदान का कोई मतलब पता था ऐसे में यहाँ सवाल यह खड़ा होता है की जिस जनता के लिए यह चुनाव है जब उसकी ही भागीदारी पर सवाल खड़े हो रहे है तो कैसे अदा हो पायेगा लोकतंत्र का फर्ज

ज़िला स्तर पर मतदाता जागरूकता की जिम्मेदारी हो या फिर चुनावों का निष्पक्ष संपादन इसकी जिम्मेदारी चुनाव आयोग द्वारा ज़िला कलेकटर को दी जाती है जिला कलेकटर ही इस मौके पर ज़िला निर्वाचन अधिकारी होता है ऐसे में मीडिया द्वारा जब भी भरतपुर ज़िला कलेकटर गिर्राज सिंह कुशवाहा से संपर्क करने का प्रयास किया जाता है तो मीडिया से दूरियां बनाते हुए बात करने से साफ़ इंकार कर देते है जिससे उनकी कार्यशैली पर भी कही न कही सवाल खड़ा होता है लोकतंत्र के इस महापर्व में जहाँ मीडिया अपनी अहम् भूमिका निभाते हुए अपने प्रत्येक कर्त्तव्य की पालना कर रहा है वही मीडिया की इस कदर उपेक्षा किया जाना कहा तक उचित है यह तो ज़िला निर्वाचन अधिकारी ही जाने परन्तु यह भी सत्य है कि मीडिया ही एक ऐसा साधन है जिसके माध्यम से जनता तक न केवल सन्देश बल्कि किसी भी विषय को लेकर जागरूकता पहुचने के लिए सर्वोत्तम है यही कारण रहा आजादी से पूर्व से लेकर आज तक मीडिया की देश के हर स्तर के आंदोलनों , अभियानों में अहम् भूमिका रही जिसके चलते ही आज देश की जनता जागरूक हुई ओर अपने अधिकारों को पहचानने के साथ उपयोग करने लगी वही हमारा भारत देश भी विश्व के मानचित्र पर महत्वपूर्ण जगह बनाने में कामयाब रहा

गौरतलब है की राजस्थान की 25 लोकसभा सीटों में से भरतपुर लोकसभा सीट भी काफी महत्वपूर्ण सीट है राजनीती के क्षेत्र में भरतपुर की हमेशा से ही एक महत्वपूर्ण भूमिका होने के साथ राज्य में भी महत्वपूर्ण स्थान रहा है वही मतदान के नजरिये से यह क्षेत्र संवेदनशील भी है हरियाणा उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के सीमा बनाने वाला यह जिला सदैव ही संवेदनशीलता को लेकर चर्चाओं का विषय रहा है वही जाट बाहुल्य क्षेत्र व् मेवात क्षेत्र में होने के कारण यहाँ जातिवादी राजनीती भी हावी रहती है जिसके चलते यहाँ साफ़ सुथरा व निष्पक्ष चुनावों के संपन्न होने के लिए आवश्यकता है की मीडिया ओर प्रशासन जैसे लोकतंत्र के अभिन्न अंग एक साथ कदम से कदम मिलकर एक दूसरे का सहयोग करते हुए अपने कर्त्तव्यों का पालन करे |

इसी प्रकार सामने आया है कि विधान सभा चुनावो में जितनी सख्ती बरती गयी थी उतनी ही छूट इस बार लोकसभा चुनावों में दी जा रही है | रसूखदार लोगो कि गाड़ियों को ना केवल विशेष छूट प्राप्त है बल्कि नियमों को ताक पर रखकर लाइसेंसी हथियार तक चुनाव आचार संहिता होने के बाबजूद जमा नहीं कराये गए हैं | एक जानकारी के अनुसार भरतपुर प्रशाशन ने मिलीभगत करके महज़ ५० प्रतिशत हथियारों को ही जमा किया है तथा काले धन को इधर उधर करने कि पूरी छूट प्रदान की गयी है | कितना भी पैसा हो या अवैध हथियारों से भरी हुयी गाड़ियां जिन्हे पुलिस खुद उत्तरप्रदेश हरियाणा आदि राज्यों से तस्करी करा रही है | पहले जहाँ हर गाड़ी की चेकिंग होती थी वही अब आँख बंद करके गाड़ी निकलने के निर्देश हैं | इसी प्रकार से निष्पक्ष चुनावों के लिए जिम्मेदार जिला निर्वाचन अधिकारी भारतीय क़ानून की धज्जियाँ उड़ाते हुए प्रत्याशियों को मूक दर्शक बन कर मौन समर्थन दिए हुए हैं | ऐसे माहोल में निष्पक्ष चुनाव कराना तो दूर सपने भी नहीं देखे जा सकते |

भरतपुर में हो रहे लोकसभा चुनावों में पूरी तरह से पैसा हावी हो चुका है और चुनाव आचार संहिता का खुलकर मखौल उड़ाया जा रहा है | आम आदमी पार्टी जहाँ पूंजी वादी पार्टी के रूप में अपने धन का नंगा नाच कर रही है वही भाजपा और कांग्रेस गरीब तबके के वोट पैसे के दम पर हासिल करने में जूट हैं | इन लोकसभा चुनावों में काले धन को खुले आम छूट देकर एक भी कारवाही को अंजाम नहीं दिया गया है | जिसके परिणामस्वरूप भरतपुर लोकसभा चुनावो में माहोल बिगड़ा हुआ दिखाई दे रहा है | अब देखना यह है कि मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का यह पैंतरा उन्हें मिशन २५ में सफलता दिलाएगा या फिर जनता एक बार फिर से जागरूक होकर अपने मताधिकार का प्रयोग करेगी और वसुंधरा के घमंड को सन २००९ कि भाँती चूर चूर कर देती है |
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