पोल पर भारी टोल | आखिर हो ही गए गुलाम |
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चाहे अंगरेजी सरकार हो या मुग़ल शाशन | सभी शासनो में भारत की जनता बस लुटती ही रही है | हर शासक का काम रहा है जनता से पैसे खींचकर जनता पर ही शासन करना | जनता तो बस टैक्स और लगान ही भरती रहती थी | खेती करनी हो तो लगान | फसल हेतु कुछ भी लाना हो तो टैक्स और यदि फसल बेचने के लिए ले गए तो लम्बे चौड़े लगान और टैक्स | कोई कुछ भी गलत बोल जाए तो उसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ता था | बस यही था हमारा गुलाम जीवन | उस जीवन में और आज के जीवन में कोई खासा फर्क नहीं महसूस होता |

आज देश आजाद हुए ६५ से अधिक वर्ष गुजर गए लेकिन आज भी लागू हैं तो अंगरेजी और मुग़ल शासन के कायदे क़ानून | आजादी के बाद हमने किया तो बस इतना कि चोर नेताओं की सहूलियत के अनुसार कानूनो में फेर बदल कर दिए | ध्यान रखा तो नेताओं की दिक्कतों का नेताजी को कोई परेशानी नहीं होने देनी चाहे ये देश ही क्यों ना बेचना पड़े | समय गुजरता गया और लोग भूल गए आजादी के असली मायने | किसी को भी याद नहीं की क्यों हुआ आजादी का महासंग्राम | फंस गए तो रोटी कपडा और मकान के झंझट में | जो मूलभूत आधार थे जीवन जीने के वे तो बन गए मूलभूत आवश्यकताए और ख़त्म हो गयी देश भक्ति की भावना | देश के लोगो के दिलो में ख़त्म होती भावनाओ का ही तो असर था की ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत के राजाओं ने बिज़नस के लिए आमंत्रित किया था | वो तो एक कंपनी थी जिसे देश वासियों ने ३५० साल तक गुलामी करके अपने हाथों में भारत का राज ले लिया था | लेकिन आज के इन राजाओं ने एक बार फिर से देश बेच दिया है | ईस्ट इंडिया कंपनी की तरह देश में अनेकों विदेशी कम्पनियों को व्यापार हेतु आमंत्रित किया है | इन कम्पनियों ने देश की नीव को खोखला करना और देश पर कब्जा करना शुरू कर दिया है |

लाखों किलोमीटर तक फैला हुआ सड़कों का जाल और इस जाल में फंसे हुए भारत के लोग दिन प्रतिदिन गुलामी की जंजीरों में जकड़ते जा रहे है | हमारे ही देश में रहने वाले सफेदपोश नेताओं ने अपने अपने क्षेत्र में सड़कों के निर्माण के बहाने हजारों करोड़ रूपये बहा दिए और इन्ही विदेशी कम्पनियों के हाथो देश की अमूल्य धरोहरों को गिरवी रख दिया | आज ये कम्पनियां नेताओं के इशारों पर काम करती हैं जिस सड़क पर भी जनता का आवागमन होता है उसे गुलाम बनाने की दिशा में अग्रसर होती है | ये कम्पनियां इन क्षेत्रों में जनता के पैसे और सरकार के ठेके से सड़क निर्माण तो करा देती हैं लेकिन आम जनता पर प्रभाव पड़ता है तो टोल टैक्स के रूप में | एक बार निकलना हो या दो बार टोल टैक्स तो देना ही होगा |

पहले नेता जनसेवक होते थे अब नेता क्षेत्रीय, राज्यीय, राष्ट्रीय, और अंतरर्रास्त्रीय स्तर के होते हैं | इसी हिसाब से बेचते हैं ये लोग आने देश को | इन नेताओं का आज कोई वर्ग चरित्र नहीं रह गया है | बस चाहिए तो सिर्फ पैसा | पैसा दो देश लो | जिस किसी भी जायज या नाजायज मांगो के लिए इन नेताओं को सिर्फ पैसा चाहिए | इसी अवधारणा पर चलते हुए अब देश के अधिकतम हिस्सों को विदेशी एजेंटों के हाथो बेच दिया है और बड़ी बड़ी सड़को के निर्माण के साथ भारत की जनता पर थोप दिया है तो टोल टैक्स | जनता अब अंग्रेजी शासन की भांति जब भी अपने घर से बहार निकलेगी तो उसको सड़क पर चलने का टैक्स देना होता है | बिना टैक्स दिए आप अपने घर से बहार नहीं निकल सकते | इसी प्रकार अब भारत के नेता तैयारी में है देश के लोगो की सांसे बेचने के लिए | हर सांस को गिनना होगा और उसपर टैक्स लगेगा | यदि टैक्स नहीं दिया तो जुर्माना और सजा दोनों के प्रावधान किये गए हैं |

अब देखना यह है की भारत के लोग अपने खाने पीने रहने चलने तथा साँस लेने पर टैक्स देने को बिना सोचे समझे भुलावे में आकर सपोर्ट करते हुए गुलामी स्वीकार करते हैं या फिर ये लोग अपने अधिकार की जानकारी रखते हुए इन नेताओं से वोट से पहले सवाल पूछते हैं |

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