पत्रकार को कलम का सिपाही कहा गया है कहते हैं कलम में बंदूक से ज्यादा ताकत होती है लेकिन यहां पर ये सभी बाते खोखली दिखाई दे रही हैं।
निरुपमा की हत्या के बाद हमने (मीडिया ने) काफी जोष और ऊर्जा के साथ कहा था कि हम निरुपमा को न्याय दिलायेंगे और कुछ दिनों तक प्रयास भी किया पर लगता है कि निरुपमा को भूल चुके हैं निरुपमा को न्याय दिलाने के लिए जो मुहिम छेंडी गई थी वह भी धीमी पड़ गई है। अब शायद ही कोई न्यूज चैनल, प्रिंट पेपर या ई-पेपर हो जो निरुपमा के लिए न्याय की मांग कर रहा हो। प्रषासन भी निरुपमा के केष में ढिलाई बरत रहा है। ऐसा लग रहा है कि यह केष भी आरूषी तलवार के ‘‘मिस्ट्र मर्डर’’’ केष की राह चल पड़ा है। डर तो इस बात का है कि कहीं यह केष भी अनुसुलझे केषों की फाइलों में दफ्न हो जाये।
निरुपमा की हत्या हुए तीन महीने हो चुके हैं लेकिन अभी तक कोई सकारात्मक तथ्य सामने नहीं आया जिससे निरुपमा की हत्या के रहस्य खुले। अगर हम ऐसे ही चुप-चाप निस्क्रिय बैठे रहे तो निरुपमा का केष भी अनसुलझे केषों ष्षुमार होगा। हमें निरुपमा के लिए न्याय की मांग को दुबारा बुलंद करना होगा ताकि फिर कोई ऐसे अमानवीय कार्य को अंजाम देने से पहले एक बार सोंचे।