रविवार, 5 सितम्बर, 2010
चिंतनः मप्र में रोटी और बेटी का रिश्ता नहीं, फिर भी जिलों की कमान
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 चिंतनः मप्र में रोटी और बेटी का रिश्ता नहीं, फिर भी जिलों की कमान
गैर हिन्दी भाषाई प्रदेशों के आईएएस तथा आईपीएस चला रहे है अधिकतर जिला

मध्यप्रदेश में गैर हिन्दी भाषाई प्रदेशों के आईएएस तथा आईपीएस को मध्यप्रदेश के अधिकतर जिलों की कमान भाजपा सरकार ने सौंपी है जिन्हे मध्यप्रदेश के जिलों की न ही संस्कृति के बारे में जानते है और न ही उन जिलों में रहने वाले लोगों की मानसिकता का अहसास है। ऐसे में प्रदेश का विकास तो बाधक होता ही है साथ ही उन जिलों की जनता को शीघ्र न्याय मिलने में महीनों इंतजार करना पड़ता है। इसका सीधा और साफ कारण स्पष्ट है कि गैर हिन्दी भाषाई प्रदेशों के आईएएस तथा आईपीएस को प्रदेश की संस्कृति, रहन-सहन बोल-चाल के बारे में पता नहीं होने के कारण प्रदेश के ग्रामीण अंचलों के विकास का पहिया थम सा गया है।

मध्यप्रदेश में जन्मे और पढ़े आईएएस और आईपीएस के पदों पर कार्यरत ऐसे अधिकारियों से चिंतन और मनन किया गया तो इन लोगों ने बताया कि गैर हिन्दी भाषाई प्रदेशों के आईएएस और आईपीएस हिन्दी भाषाई प्रदेशों में काम कर रहे है खासतौर पर मध्यप्रदेश में ऐसे अधिकारियों से प्रदेश का पिछड़ापन दूर किया जाना असम्भव है। अगर यह कहें कि ऐसे अधिकारियों का हिन्दी भाषाई प्रदेशों में न तो रोटी का रिश्ता है और न ही बेटी का रिश्ता है इस कारण उन्हे यहां के पिछड़पन का एहसास नही है, गरीबों की गरीबी का दर्द नहीं है, शोषित एवं दबे कुचले समाजिक वातारण से अनभिज्ञ है, सामंशाही वातावरण से दूर रहते है, ऐसे में प्रदेश के ग्रमीण अंचलों का विकास थमना जायज है।

चिन्तन में एक यह भी कारण उभरकर सामने आया है कि गैर भाषाई प्रदेशों के आईएएस और आईपीएस का एक मात्र ध्येय होता है कि आलीशान नौकरी में नियम के अनुरूप चलकर काम करना। वातानुकूलित वातावरण में रहकर काम करना इन लोगों की सबसे पहली पसंद होती है। फील्ड पर जाने से कतराते है। एकांकी जीवन जीना एवं अपने काम का बोझ अधीनस्थों पर डालकर अपनी बलाय को टालना ऐसे लोगों की फिदरत में समाहित रहती है। इस पिछड़े मध्यप्रदेश में गैर हिन्दी भाषाई प्रदेशों के आईएएस और आईपीएस को जिम्मेदारियां देना प्रदेश की जनता के साथ अन्याय है। चिन्तन में दूसरा यह भी पक्ष उभरकर सामने आया है कि प्रदेश का काफी हद तक पिछड़ापन दूर करने में हिन्दी भाषाई प्रदेशों के आईएएस तथा आईपीएस अधिकारियों की भूमिका सराहनीय रही है। ऐसे अधिकारी जिन्होने जिले से लेकर प्रदेश तक की कमान अपने पास रखी है तो इन लोगों ने फील्डवर्क कर दबे, कुचले, शोषित, गरीब, यहां तक कि आमजनमानस के लिये जनहित कल्याणकारी योजनायें नियम कानून को शिथिल करते हुये बनाई ताकि उन्हे इन योजनाओं का लाभ देने में नियम कानून आड़े न आ सके। परन्तु दर्भाग्य इस मध्यप्रदेश का जब से गैर भाषाई प्रदेशों के आईएएस और आईपीस अधिकारियों ने वातानुकूलित वातावरण में बैठकर पूरे देश के लिये जो जनहित कल्याणकारी योजनायें बनाई है वह सिर्फ कागजों एवं समाचार पत्रों में निकलने वाले विज्ञापनों में ही लाभान्वित दिखती है जब उन योजनाओं का लाभ लेने की कोशिश की गई तो उन नियमों की पूर्ति आजतक कोई नहीं कर पाया और इसका फायदा बड़े बड़े पदों पर बैठे आला अफसरों ने बंदरबांट करके ही ले पाया है। देश भर के प्रदेशों में वर्तमान समय में करोड़ों रूपया केन्द्र सरकार से आ रहा है और केन्द्र सरकार में जो गैर हिन्दी भाषाई प्रदेशों के सांसद और मंत्री बने बैठे है ऐसे राजनेताओं ने अपने अपने प्रदेशों के आला अफसरों को अपने अपने विभागों में बुलाकर रखा है और जो योजनायें बनवाई गई उन योजनाओं को सिर्फ एक आलाउद्दीन का चिराग बताकर प्रसारित करवाया गया या फिर मुंगेरी लाल के हंसीन सपने दिखाकर उन्हे संजोया गया। इसी प्रकार हिन्दी भाषाई प्रदेशों में गैर हिन्दी भाषाई प्रदेशों के आईएएस और आईपीएस ने अपने पैर जमाना शुरू कर दिये और ऐसे दिमागदार अधिकारियों ने राजनेताओं को अलग थलग कर अपना सिक्का चलाने की मुहिम चलाई और आज सफल भी हो रहे है। केन्द्र और प्रदेश सरकार द्वारा बनाई जाने वाली जनहित कल्याणकारी योजनाओं को करोड़ों रूपये के बजट आवंटन के साथ प्रदेश के सभी जिलों में एक साथ क्रियान्वियित की जाती है। परन्तु गैर भाषाई प्रदेशों के आईएएस और आईपीएस के हांथों से नियमों की लक्ष्मण रेखा पार कर लाभांवित हो पाना दांतों तले लोहे के चबाने के बराबर है। जिन जिलों में आज भी हिन्दी भाषाई प्रदेशों के आईएएस और आईपीएस काम कर रहे है उन जिलों में विकास के पहिये काफी हद तक दूरी तय कर लेते है। परन्तु जैसे ही गैर भाषाई प्रदेशों के आईएएस और आईपीएस पदस्थ होते है वैसे ही विकास की दूरी तय करने वाले पहिये थम से जाते है।

मध्यप्रदेश का इतिहास गवाह है इस प्रदेश की ग्रामीण जनता खासतौर पर बुन्देलखण्ड की जनता आज भी कलेक्टर और एसपी को अपना राजा मानती है अपना भगवान मानती है। जब तक अपना दुख दर्द कलेक्टर और एसपी को नही सुना लेते है तक तक उनके गले से रोटी का एक कौर भी नीचंे नही उतरता है और ऐसे मे जब उनका राजा यानि भगवान यानि कलेक्टर एसपी मिलने को एक कदम भी आगे नहीं बढाते है तब उन्हे लगता है कि अंग्रेजों का शासन अच्छा था, अंग्रेजों की गुलामी अच्छी थी, कम से कम दो वक्त की रोटी की गारंटी तो होती थी। यह एक ऐसा बिषय है जिस पर चिंतन कई घंटे कई दिनो कई वर्षों तक किया जाये तो कभी खतम नहीं होगा और लेखक की लेखनी अगर चलती जाये तो एक इतिहास सच्चाई के रूप में किताब बनकर सामने आ सकता है।

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