रविवार, 5 सितम्बर, 2010
मातृभूमि क्यों रुन्दन करती, पुत्र तेरे अभी जीवित है ?
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 मातृभूमि क्यों रुन्दन करती, पुत्र तेरे अभी जीवित है ?
भारतवर्ष एक प्राचीन देश है! इसकी पुरातन संस्कृति ही इसकी पहचान है! पूरे संसार को सकारात्मक सन्देश देने वाली कई घटनाएँ यहाँ पर घटी है! इतनी उथल पुथल के बाद भी अपना भारतवर्ष अपनी पुरातन संस्कृति के लिए जाना जाता है! लेकिन अज परिस्थितियाँ कुछ बदल रही है! तथाकथित आदुनिक शिक्षा के नाम पर समाज को आपने मूल से दूर किया जा रहा है! एक समय ऐसा भी था जब अपनी संस्कृति के लिए गज़ब का प्रेम था! लोग प्रयासरत रहते थे की किसी तरह से अपनी संस्कृति का संरक्षण किया जा सके! लेकिन इसे विडंबना ही कहेंगे कि आज के समय में अपनी संस्कृति के बारे में चर्चा करना पुराने ख्यालो कि बात माना जाता है! आधुनिक बनाने कि होड़ में संस्कृति को पीछे छोड़ा जा रहा है! वो कहावत चरितार्थ होती है कि न माया मिली न राम! न ही आधुनिक हुए ना संस्कृति का संरक्षण कर पाए ! आज इन सब बातो के लिए लोग समय नही निकलना चाहते है! आधुनिकता कि परिभाषा क्या है? विचारो का नैतिक पतन आधुनिकता नही है! अंग्रेजी शिक्ष्विद मेकाले ने जब कहा था कि अगर भारत पर राज करना है तो इसकी शिक्षा पद्दति को बदलना होगा और उसने ठीक वेसा ही किया, भारत कि शिक्षा पद्दति को बदला और अंग्रेजी शिक्षा पद्दति को लागू किया! आज राष्ट्र कि हालत ठीक नही है! क्यों कि हमारी शिक्षा ऐसी है जो सिर्फ अधिकार कि याद दिलाती है और कर्तव्य को भुलाती है!ऐसी शिक्षा क्या लाभ क्या? आज मानसिकता का संकट सामने है! और षड़यंत्र को समझने में सभी नाकाम है! मेरी मातृभूमि आज कई संकटों से घिरी है! आतंकवाद गंभीर समस्या है वो भी कई तरह का है! राजनीतिक हमला ,आतंकवाद कह सकते है आर्थिक आतंकवाद, सांस्कृतिक आतंकवाद ...और भी कई कई!

राजनीतिक आतंकवाद का अर्थ यह है कि देश चारो ओर से घिरा हुआ है! चीन , पाकिस्तान तो इंतज़ार में बेठे है! और भी कई विदेशी तकते है जो भारत का भला नही देख सकती! ऐसे में सीधा अर्थ है कि हम पर संकट है! हमारे मातृभूमि संकट में है, यदि ऐसा है तो हमारी अन्न देने वाली माता क साथ साथ जन्म देने वाली माँ भी खतरे में है! हमारा परिवार , हमारा समाज ,सारा देश खतरे में है! तो गौर से देखे कि यह खतरा जो सीमा पार से आ रहा है , कभी जिहाद के नाम से तो कभी युद्ध के रूप में, क्या ये केवल राजनेताओ को नुक्सान करेगा! क्या केवल थोड़े लोग प्रभावित होंगे? नही सारा देश प्रभावित होगा! कारगिल का युद्ध प्रमाण है कि क्या हुआ! युद्ध एक स्थान पर हुआ, प्रभाव सारे देश में हुआ! आर्थिक , जान माल सब तरह का नुक्सान हुआ! वहा जो सरहद पे मेरी मातृभूमि को बचाने के लिए लड़ा वो सारे मुल्क का पुत्र था! और है भी! दुआएं निकले तो सबकी निकली कि हमारे देश के जवान सफल हो जाए ! युद्ध ह्म्जीते लेकिन नुक्सान भी हुआ! लेकिन इतने युद्ध सबमे हार भी पाकिस्तान को समझा नही रही है! कई समझोते हुए जिसमे कहा गया कि कोई भी आक्रमण नही करेगा, न किसी कि ज़मीन पर कब्ज़ा करेगा! २० अक्तू १९४७ को पाकिस्तान ने पहला हमला किया! अपने जन्म से ही उसकी आदत रही आज भी कायम है! अब सब लोग कहते है कि हम क्या कर सकते है? में किसी से सरहद पे जाने कि अपील नही कर रहा हूँ! लेकिन मदद कि बात है तो हम कर सकते है!

दूसरा था आर्थिक आतंकवाद ! आर्थिक आतंकवाद क्या होता है ये समझ में इस तरह से आ सकता है कि हमारी जो आर्थिकी है उसे नुक्सान पहुँचाना! उसे नुक्सान कोन और केसे पहुंचा रहा है, तो कई उत्तर है! एक तो है विदेशी वस्तुओ का प्रयोग! कई देनिक वस्तुए ऐसे है जिसे हम केवल इस लिए प्रयोग करते है क्यों कि ये विदेशी है! क्या केवल इतना ही काफी है!स्वदेशी को हम घटिया करार देते है! जब कि हम उसके बारे में कुछ जानते तक नही! ये भी एक चाल है! हमारी मानसिकता को इस तरह से ढला गया है कि अपनी चीज़ बुरी लगती है!

हम अगर ध्यान से अपनी समस्याओ को देखे तो कई तार जुड़ते हुए नज़र आएँगे! देश कि समस्याओ कि जड़ गरीबी और बेरोज़गारी जे जुडी है! नाक्साली या आतंकी कोन है? जो गरीब है! यदि हम स्वदेशी वस्तुए प्रयोग करेंगे तो हमारे देश के लाखो लोगो को रोज़गार मिलेगा और हमें भी सस्ती कीमत पर चीज़े उपलब्ध हो जाएगी! और देश के लाखो लोगो को रोज़गार मिलेगा! हम लोग कीमती जूते पहनते है यदि अपने देश में बने जूते पहने तो लाभ हमें हे होगा! हम विदेशी कपडे पहनते है यदि देश में बने वस्त्रो का उपयोग करे तो लाभ होगा हमें भी देश को भी! हमारे देश में सूती कपडे का काम कम है फिर भी लाखो लोगो कि आजीविका है इस से यदि हम सूती वस्त्र ज्यादा उपयोग करेंगे विदेशी कि तुलना में तो कई लोग बन्दूक कि जगह कपडा मिल में काम कर क इज्ज़त कि रोटी कमाएँगे ! और भी बहुत सी ऐसी चीज़े है जो हमारी मेहनत कि कमाई को विदेश में ले जाती है! ये देश के खिलाफ है! जो कि हर प्रकार से गलत है

संस्कृतिक आतंकवाद भी कुछ ऐसी ही कहानी लिए बैठा है! विदेशी ताकतों ने हमारी संस्कृति पर आघात करने संस्कृतिक रूप से कमज़ोर हो जाएँगे! जो कि देश कि अखंडता के लिए घटक होगा! जब देश कि संस्कृति को सम्मान नही देंगे तो देश नही bachega! हमारा देश का राजनीतिक ढांचा भी आज रह से भटक गया है! कोई भी राजनीतिक पार्टी पर विशवास नही करता! देश का रक्षक कहने वाले राजनीतिक दल भक्षक बन गये है तो समस्या कितनी गंभीर है हम सोच सकते है! लेकिन सारा दोष राजनीती पर दाल कर आम जनता भी मातृभूमि को रुलाने के पाप से मुक्त नही हो सकती! देश का रजा से लेकर प्रजा तक दोषी है, तो कोन बचेगा देश को! एक आवाज़ आती है युवा.......

मेरे भी मन में उमंग उठती है कि मेरी मातृभूमि कि युवा औलाद, युवा शक्ति मेरे बंधू देश कि रक्ष करेन्गे१ लेकिन अगले हे पल जब स्थिति पर दृष्टिपात करता हू तो पाता हूँ कि देश कि युवा शक्ति नशे के गर्त में समां रही है! एक असहनीय वेदना होती है१ ऐसा नही है कि सभी ऐसे है लेकिन जो है वो सब संस्कृतिक आतंकवाद के शिकार है! नशे में देश का भविष्य डूबा हुआ है...जो एक आशा कि किरण नज़र आ रही थी वो भी षड्यंत्रों के बदलो में खो सी रही है!लेकिन लुप्त नही हुई है! आग बुझी नही है सुलग रही है! और ये आग बुझनी नही चाहिए..बल्कि और बढनी चाहिए ! इतनी ज्यादा कि देश कि तबाही में जुटी ताकतों को धुल चटा दे! देखने वाली बात है...जनता सोयी हुई है..यह कहती है कि तो क्या हुआ यदि समाज में पश्चमी चीज़े आ रही है ..हम आधुनिक हो रहे है! क्या यह आधुनुकता है अपनी संस्कृति को नष्ट करना और नशे में लिप्त रहना..आधुनिकता नही है!यदि है तो हम आधुनिक नही होना चाहेंगे! जिस संस्कृति में माता पिता और परिवार कि इज्ज़त न हो..वो आधुनिकता केसे है! जब कोई कह रहा है कि इस तरह कि चीज़े न देखो न अपनाओ हमारी संस्कृति ५००० साल पुरानी है नष्ट हो रही है! तो कुछ तथाकथित आधुनिक लोग कहते है कि आप तो ५००० साल पीछे जाने को कह रहे है!किसी भी वृक्ष को पलना हो तो जड़ो को सींचा जाता है! सनद रहे ५००० साल पहले हम विश्व गुरु थे इसी संस्कृति के दम पर! आज नशे में डूबे है! आधुनिकता का अर्थ है दिमाग का नयापन..नयी सोच! जो जीवन को गर्त में धकेले वो आधुनिकता नही है!

अंत में अपील सभी से है कि देश अपना है इसकी समस्याए सामान रूप से अपनी है! कर्तव्य भी है जो सबके है! राजनीतिक पार्टिया भी है लेकिन उन्हें ठेका नही दिया है देश का! कि गलत करता है तो आवाज़ आम लोगो को उठानी चाहिए! स्वार्थ और सर अपने तक सीमित होने के चले समाज कि ये दुर्दशा है! जब तक अपनी गर्दन कि बारी न आए कोई नही हिलता! हमारी दुर्दशा के जिम्मेवार हम भी है! देश में कई देश भक्त युवा है! उन्हें प्रोत्साहित करना सबका कर्तव्य है! आज देश को किसी क्रिक्केटर या व्यापारी या डॉक्टर से ज्यादा देशभक्त कि जरुरत है एक जागरूख समाज कि जरुरत है!

हम युवा यह कर सकते है! मेरे युवा मित्र इस देश को बचाने में समर्थ है! बस सबका सहयोग चाहिए! देश मेरा या आपका हे नहीं सबका है!
वन्दे मातरम
हम उबलते हैं,तो भूचाल उबल जाते हैं .
हम मचलते हैं,तो तूफ़ान मचल जाते हैं .
हमको बदलने की कोशिश मत करना ,
क्योंकि हम बदलते हैं तो इतिहास बदल जाते हैं
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From : ess.key.yadav@gmail.com

After going through your views, I have changed my opinion about indian politicians. I was under impression that all politicians are equal, but no, young politicians are really having a unique spark which can change the pattern of indian people's iife. Best of luck surabh ji.....hope you will keep continue your steps up for your goal.

on : 7/2/2010 12:47:45 AM

From : ashishmandwariya@ymail.com

bahut accha socha aur likha hai sourabh...... muze lagta hai ki agar is desh ka yuwa agar man me thaan le to is desh par koi sankat nahi aa sakta....ek baat aur kaafi acchi lagi ki jub tak apne upar aapda nahi aati tab tak koi sir nahi hilata ......very nice....

on : 7/2/2010 10:10:00 AM

From : cmdhakad_abvp@rediffmail.com

bahut hi sundar lekh he yadi bharat ke yuva sachet hokar dhyan dhare to koi taqat hame hara nahi sakti ....virodhi dhul me mil jayenge,,,,,vande mataram

on : 7/4/2010 3:18:55 AM

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